औरत तेरी यही कहानी, 

हर रिश्ता माँगे कुरबानी,

दिल का दर्द सहे छुप छुप के,

आँसु पोंछ अपने आँचल से,  

कहे, ‘ कुछ नही, था वो पानी’
औरत तेरी यही कहानी,

भावुक होकर युं पल भर में,

मिटा दे अपनी ही ज़िदगानी,

माँ बाप के घर की रोशनी,

ससुराल में जलती जाती,

मिटा के अपनी खुशियाँ सारी,

दूजों की झोली भरती जाती,
औरत तेरी यही कहानी,

बन कली जो खिली इक बगिया में,

बन फूल हर कदम कुचली जाती,

राजकुमारी जैसे जीती बचपन में,

पल भर में बन जाती दासी,

दुख से भरी हो जिसकी जीवनी,

खुशियाँ दर दर वो बिखराती,
औरत तेरी यही कहानी,

पँछि बन उड़ने की चाहत, 

खुला आकाश छूने की ख्वाहिश,

काश जी सकती अपने सपने,

कटे न होते तेरे ये पर,

बन पतंग हवाओं से बतियाती,

गर डोर तेरी न काटी जाती,
औरत तेरी यही कहानी,

बस पिंजरे में सिसकी भरती,

सहना सब पर कहना न कुछ,

न थकना, न हताश होना,

न मुस्कान का कम होना,

दुखोंमें अपने सुख को ढूंढना,

दिल की गागर में सागर होना,
औरत तेरी यही कहानी,

न माँ, न मायका अपना,

ससुराल भी पराया होता,

पति के चरणों के धूल की भांति,

क्या कभी तू भी समझी जाती,

किस कोने में घर है तेरा,

ये जग तो पल भर का डेरा,
औरत तेरी यही कहानी,

ना तेरी हाँ समझी जाती,

चुप्पी तेरी सहमती जताती,

आखिर में तेरी बारी आती,

मान नही, अभिमान नही,

तेरा कभी सम्मान नही,

बस मर्यादा में फंस जाती,
औरत तेरी यही कहानी,

दुख की कलम से लिखी जाती,

दर्द भरी स्याहि से,

आँसुओं के पन्ने में समाती,

जो चाहे वो कभी न पाती,

अपने मन की कह न पाती,

बस चुपचाप ही सहती जाती,
औरत तेरी यही कहानी,

सहनशीलता की निशानी,

चुप्पी तोड़, अब कह दे सब कुछ,

आँसु पोंछ कर हँस दे अब बस,

और नही, अब और नही,

दुख भरी ये दास्तान और नही,

खुशियों की कलम से लिख दे अब,

सुख परिपूर्ण इक नई कहानी।
औरत तेरी यही कहानी, 

हर रिश्ता माँगे कुरबानी,

दिल का दर्द सहे छुप छुप के,

आँसु पोंछ अपने आँचल से,  

कहे, ‘ कुछ नही, था वो पानी’।

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